परिचय
- केन्द्र एवं राज्य संघीयता के लिए आवश्यक विशेषता है। एक संघीय संविधान केन्द्र व राज्य में परिधि की तरह दोहरी नीति अपनाता है व संविधान द्वारा प्रत्येक को विशेष क्षेत्र में संप्रभूत्व शक्तियों के उपयोग करने के लिए अधिकृत किया गया है।
- संघवाद का मुख्य लक्षण यह है कि विधायी, कार्यपालिका एवं वित्तीय शक्ति का केन्द्र व राज्यों के मध्य विभाजन किया गया है, वह भी केन्द्र द्वारा पारित किये गए किसी कानून द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं संविधान द्वारा।
विधायी संबंध
हमारे संविधान निर्माताओं ने केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए केनेडियाई स्कीम को चुना है। इसीलिए उन्होने एक और सुची को इसमें जोड़ा है– समवर्त्ती सूची।
वर्तमान संविधान में भारत सरकार अधिनियम 1935 के नियमों को अपनाते हुए, केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का तीन सूचियों में विभाजन किया है। वे है– संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्त्ती सूची।
संघ सूची – वर्तमान में संघ सूची में 100 विषय है परन्तु संविधान निर्माण के समय में ये 97 थे।
उदाहरण :- रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, मुद्रा, सिक्का प्रणाली, नागरिकता, पोस्ट एवं टेलिग्राफ आदि।
राज्य सूची : राज्य सूची में वर्तमान में 61 विषय हैं (पांच विषयों को छोड़कर जो कि बाद में हटा दिये गए थे।)
उदाहरण : सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस, स्थानीय सरकार, सार्वजनिक स्वास्थय एवं स्वच्छता, कृषि, न्याय, सिंचाई आदि।
समवर्त्ती सूची में दिये गए विषयों पर केंद्र व राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं लेकिन यदि समवर्ती सूची के विषय पर बनाये गए कानून पर केंद्र व राज्य में मतभेद है तो वह कानून मान्य होगा जो केन्द्र द्वारा बनाया गया है।
अवशिष्ट शक्तियाँ
अनुच्छेद 248 के तहत सभी अवशिष्ट शक्तियाँ संसद में निहित है। इसके अनुसार संसद के पास विशेष शक्तियां है जो राज्य या समवर्त्ती सूची के किसी भी विषय पर कानून बना सकती है।