वायुमण्डल
पृथ्वी
के चारों ओर
कई सौ किमी. की मोटाई
में व्याम्त
गैसीय आवरण को
वायुमण्डल
कहते है ।
वायुमण्डल
अनेक गैसों का
मिश्रण हैं।
ये
गैस निम्नलिखित
हैं :-
गैस
|
प्रतिशत
|
नाइट्रोजन
|
78.08%
|
ऑक्सीजन
|
20.24
%
|
ऑर्गन
|
0.93.1%
|
CO 2
|
0.03%
|
नियॉन
|
0.081%
|
हीलियन
|
0.0005%
|
ओजोन
|
0.00006%
|
वायुमण्डल
की ऊचाई 19 से 29
हजार
किमी तक बतायी
जाती है परन्तु
धरातल से
केवल 800
किमी
तक ऊचा
वायुमण्डल
ही अधिक महत्वपुर्ण
है।
वायुमण्डल
की परतें
क्षोभमण्डल
(Troposphere)
Ø
यह
पृथ्वी की
सतह से सबसे
नजदीक होती है
। इसकी ऊचाई विषुवत
रेखा (16
किमी
) से
ध्रुवो (8 किमी ) की ओर जाने
पर घटती है।
सभी मौसमी
घटनाए इसी परत
में सम्पन्न
होती है।
Ø
यह
अन्य सभी
परतो से घनी
है और यहा पर
जलवाष्प, धूलकण , आर्द्रता
आदि मिलते है
। मौसम सम्बन्धी
अधिकांश
परिवर्तनो के
लिए क्षोभमण्डल
ही उत्तरदायी
है।
Ø
ताप
हास दर केवल
ऊचाई से ही
नही बल्कि
अक्षांशो से
भी प्रभावित
होती है । इस
नियम के
अनुसार यह दर
उच्च तापमान
वाले धरातल के
ऊपर ऊच्च तथा
निम्न
तापमान वाले
धरातल के ऊपर
निम्न होती
है ।
Ø
क्षोभमण्डल
के ऊपर शीर्ष
पर स्थित
क्षोभमण्डल
सीमा (Tropopause) इसे समताप
मण्डल से अलग
करती है ।
इसको संवहन
मण्डल भी कहा
जाता है ।
समताप
मंडल
- इसकी ऊंचाई 50 किलोमीटर तक होती है।
- इस में तापमान में ऊंचाई के साथ वृद्धि नहीं होती है तापमान समान रहता है।
- यह परत वायुयान चालकों के लिए आदर्श होती है।
- इस मंडल में जलवाष्प धूलकण आदि नहीं पाए जाते हैं इसमें बादलों का अभाव होता है।
- इस मंडल में ओजोन परत होती है जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती है ,इस कारण ओजोन परत में ऊंचाई के साथ तापमान बढ़ता है।
मध्यमंडल
- यह 80 किलोमीटर की ऊंचाई तक होता है।
- इसमें ऊंचाई के साथ तापमान में गिरावट होती है और 80 किलोमीटर की ऊंचाई पर तापमान 100 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है।
आयन मंडल - -- इसे तापमान
भी कहा जाता
है। इस मंडल
का फैलाव 50 किलोमीटर
से लेकर 400 किलोमीटर
की ऊंचाई तक है। इस
मंडल में
तापमान तेजी
से बढ़ता है, पृथ्वी
से प्रेषित
रेडियो तरंगे
इसी मंडल से टकराकर
पुनः पृथ्वी
पर वापस लौटती
है।
बाह्यमंडल ---- यह
वायुमंडल की
सबसे ऊपरी परत
है। इसकी बाह्य
सीमा पर
तापमान लगभग 5568 डिग्री
सेल्सियस तक होता
है। इसमें
हाइड्रोजन व
हीलियम गैस की
प्रधानता होती
है।
वायुमंडलीय
दाब ----- धरातल
पर या सागर तल
पर क्षेत्रफल
की प्रति इकाई
पर
उपर
स्थित
वायुमंडल की
समस्त परसों के
पढ़ने वाले भार को
ही वायुमंडल
कहा जाता है। इसे
बैरोमीटर
द्वारा मापा
जाता है। सागर
तल पर वायुदाब
अधिकतम होता
है। वायुमंडल
में जलवाष्प
की मात्रा
बढ़ने पर वायुदाब
में कमी आ
जाती है।
चक्रवात
और
प्रतिचक्रवात
- अस्थिर एवं परिवर्तनशील हवाओं के वायुमंडलीय भंवर जिनके केंद्र से निम्न वायुदाब और केंद्र के बाहर उच्च वायुदाब होता है, चक्रवात कहलाता ह,।
- चक्रवात के ठीक विपरीत प्रतिचक्रवात में निम्न वायुदाब की वृत्ताकार रेखाओं के केंद्र में उच्च वायुदाब होता है। ऐसी स्थिति में हवाएं केंद्र से बाहर परिधि की तरफ चलती है।
- चक्रवात की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत होती है तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुई की दिशा में होती है।
- प्रतिचक्रवात की दिशा चक्रवात के ठीक विपरीत होती है, अर्थात उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई के अनुकूल एवं दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुई के विपरीत होती है।
- चक्रवातों को अलग-अलग जगहों पर अलग अलग नाम होते हैं ---
1 टॉर्नेडोस
|
तटीय
अमेरिका
|
2 हरीकेन
|
कैरीबियन
द्वीपसमूह
|
3 विली
- विलीज
|
ऑस्ट्रेलिया
|
4 चक्रवात
|
हिंद
महासागर
|
5 ट्विस्टर
|
स्थलीय
अमेरिका
|
6 टाइफून
|
दक्षिणी
चीन सागर
|
जलमंडल
जलमंडल
से तात्पर्य
पृथ्वी पर
उपस्थित
समस्त जलराशि से
है।
पृथ्वी
की सतह के 71% भाग
पर जल उपस्थित
है।
उत्तरी
गोलार्ध में
जल मंडल तथा
स्थल गोलार्ध
तथा स्थलमंडल
लगभग बराबर है, परंतु
दक्षिणी
गोलार्ध में
जलमंडल, स्थलमंडल
से 15
गुना
अधिक है। जलमंडल
के अधिकतर भाग
पर महासागरों
का विस्तार है
और बाकी भाग
पर सागर तथा झीलें
है।
महासागर
चार है, जिनमें
प्रशांत
महासागर सबसे
बड़ा है । बाकी
टीम इस प्रकार
है आकार के
हिसाब से
आंध्र या
अटलांटिक
महासागर, हिंद महासागर
और आर्कटिक
महासागर ।
महासागरों
की औसत गहराई 4000 मीटर
है।
महासागरीय
धरातल
महासागरों
का धरातल समतल
नहीं है।
महासागरीय
धरातल को
निम्नलिखित
भागों में विभक्त
किया जा सकता
है-------
महाद्वीपीय
मग्नतट ---
यह
महा सागर तट
से समुद्री
सतह की ओर चलने
वाला जलमग्न
धरातल होता
है।
- सामान्यतः यह शौक है दम की गहराई तक होता है (1 फैदम = 1.8 मीटर) ।
- जिन तत्वों पर पर्वत समुद्री तट के साथ खेले रहते हैं, वहां मग्नतट संकरा होता है।
- विश्व में तेल व गैस का कुल 20% भाग यहां पाया जाता है।
- मग्न तट समुद्री जीव जंतुओं के समृद्धता स्थल है। मछली और समुद्री खाद्य प्रदान करने की इन की अति महत्वपूर्ण भूमिका है।
महाद्वीपीय
ढाल ----
- महाद्वीपीय मग्नतट की समाप्ति पर महाद्वीपीय ढाल आरंभ होता है।
- महाद्वीपीय मग्नतट और महाद्वीपीय ढाल के बीच की सीमा ऐंडे साइट रेखा कहलाती है क्योंकि यहां ऐंडे साइट चट्टानें मिलती है।
- यह 2000 के फैदम की गहराई तक होती है।
महाद्वीपीय
उत्थान----
- महाद्वीपीय ढाल की समाप्ति पर महासागरीय धरातल कुछ ऊपर को उठा हुआ मिलता है।
- अवशिष्ट पदार्थों के जमा होने के कारण महाद्वीपीय उत्थान बनते हैं।
- यहां गैस एवं तेल का शेष 80% भाग पाया जाता है।
अंतः
सागरीय कटक ---
- यह कुछ 100 किलोमीटर चौड़ी वह हजारों किलोमीटर लंबी अंतः सागरीय पर्वत मालाएं है।
- यह रीज अलग-अलग आकारों के होते हैं, जैसे अटलांटिक रिज s आकार , हिंद महासागर रिज , उल्टे Y आकार का
- जो रिज 1000 मीटर से ऊंचे होते हैं वह वितलीय पहाड़ी या समुद्री टीला कहलाते हैं ।
- ऐसे पहाड़ जिनकी चोटियां समतल होती है, निमग्न द्वीप कहलाते हैं। इनका उदभव ज्वालामुखी है क्रियाओं से हुआ है और कुछ वितलीय पहाड़ समुद्र के ऊपर तक पहुंच कर द्वीपों का निर्माण करते हैं ,हवाई द्वीपों का निर्माण ऐसे ही हुआ है।
अंतः
सागरीय गर्त ---
- यह महासागर की सबसे गहरी भाग होते हैं, इनकी औसत गहराई 5500 मीटर होती ह,।
- गत लंबा, संकरा वह तीव्र पार्श्व वाला सागरीय जल में हुआ और अवनमन है।
- प्रशांत महासागर में सबसे ज्यादा गर्त पाए जाते हैं , प्रशांत महासागर में ही विश्व की सबसे गहरी गर्त 11033 मीटर मेरियाना गर्त फिलीपींस के पास स्थित है।
- प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार महासागरीय गर्त, प्लेट अभिसरण क्षेत्र में महासागरीय प्लेट के क्षेपण के जॉन को चिन्हित करते हैं। ऐसे क्षेत्र पर्वत निर्माण और ज्वालामुखी गतिविधियों से संबंधित होते हैं इसलिए अधिकांश महासागरीय गर्त द्वीप समूह के तट के सहारे वलित पर्वत श्रंखलाओं के आसपास तथा इनके समानांतर पाए जाते हैं।