पश्चिमी स्थापत्य एवं मूर्तिकला
ग्रीक स्थापत्य व मूर्तिकला
1. ग्रीक संस्कृति की सबसे
खास बात यह थी कि कला व संस्कृति में उसकी
दृष्टि काफी
हद तक लौकिक थी। उनकी इसी सोच का पूरी तरह से प्रभाव
उनके स्थापत्य व मूर्तिकला में परिलक्षित होता है। ग्रीक संस्कृति पर कई बाहरी शक्तियों की सोच का भी पूरा असर था। लगभग
1000 ई.पू. के आसपास
ग्रीस पर उत्तर से डोरियन और पूर्व से अयोनियन लोगों
ने आक्रमण
किया। इन दोनों शक्तियों ने ग्रीक
संस्कृति को काफी कुछ सिखाया। डोरियन
अपने साथ जहाँ लकड़ी
के भवन निर्माण की कला लाये,
वहीं अयोनियन
अपने साथ अलंकारमय नक्काशी
लाये। यह वह काल था जब एथेंस सबसे
प्रभावशाली सिटी-स्टेट था। इसी काल में भवन निर्माण में शहतीर का प्रयोग होने
लगा। एथेंस
का एक्रोपोलिस इस बात का सबसे
प्रमुख उदाहरण
है। इस भवन का उपयोग प्रशासनिक व धार्मिक
कार्र्यों को सम्पन्न करने
के लिए किया जाता
था।
2. चौथी शताब्दी
ई.पू. के आसपास
ग्रीक स्थापत्य व मूर्तिकला ने एक नई शैली
कोरिन्थियन को जन्म दिया।
यह एक ऐसी शैली
थी जिसमें
अलंकरण पर काफी ज्यादा
जोर दिया
जाता था। ग्रीक कलाकारों ने मूर्तिकला में भी अपने हुनर
को दिखाया
और देवी-देवताओं, नायकों,
नायिकाओं आदि की सुंदर
मूर्तियों का निर्माण किया।
ग्रीक मूर्तिकला की सबसे
खास बात मूर्तियों की लौकिकता है। शरीर की आकृतियों को अत्यंत बलिष्ठ
और यथार्थ
रूप में दिखाने की कोशिश की जाती थी।
रोमन शैली
1. प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य काफी विशाल
था। इस साम्राज्य की विशालता की झलक उसके
विशाल भवनों
में देखा
जा सकता
है। रोमन
वास्तुशिल्पियों ने सर्वप्रथम चापाकार
निर्माण अद्र्ध
वृत्ताकार मेहराब
का प्रयोग
किया। इसका
विकास लंबी
मेहराब, अनुप्रस्थ मेहराब और गुंबद में हुआ।
2.रोमन वास्तुशिल्पियों ने मंदिरों और महलों, सार्वजनिक स्नानागारों और व्यायामशालाओं, सर्कसों
व वृत्ताकार रंगशालाओं, सड़कों,
सेतुओं और सीवर प्रणालियों का खूबसूरती व भव्यता
के साथ निर्माण किया।
रोमन वास्तु
व स्थापत्य की एक खास बात गिरिजाघरों का निर्माण था। गिरिजाघरों का निर्माण सम्राट
कांस्टेन्टाइन ने चौथी शताब्दी
में शुरु
करवाया जब उसने ईसाई
धर्म को अपनाया। इसके
लिए बेसेलिका को आदर्श
बनाया गया।
रोमन साम्राज्य में यह एक व्यापारिक हाल हुआ करता था। इसकी एक मुख्य विशेषता
एक लंबी,
केेंद्रीय पिंडी
हुआ करती
थी जो दो निचली
पीथिकाओं से घिरी रहती
थी। आगे चलकर गिरिजाघरों की शैली
इससे काफी
हद तक प्रभावित हुई।
3. रोमन कलाकार
मूर्तिकला में भी सिद्धहस्त थे। इस मामले में रोमन शैली
काफी हद तक ग्रीक
शैली से मिलती-जुलती
थी। रोमन
शैली में भी यथार्थवाद के दर्शन
होते हैं।
अधिकांश मूर्तियाँ अद्र्ध-प्रतिमाओं के रूप में और घुड़सवारों की हैं। मूर्तियों में शारीरिक
चित्रण अत्यंत
ही सुंदर
है।