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Geomorphology भू आकृतिक विज्ञान


भू आकृतिक विज्ञान

पृथ्वी की उत्पत्ति व भूगर्भिक इतिहास

- पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सर्वप्रथम तर्कपूर्ण परिकल्पना का प्रतिपादन फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्त--बफन द्वारा 1749 . में किया गया।

- पृथ्वी एवं अन्य ग्रहों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में 2 प्रकार की संकल्पनाएं दी गयीं-

1. अद्वैतवादी परिकल्पना

2. द्वैतवादी परिकल्पना

- अद्वैतवादी परिकल्पना में कांट की गैसीय परिकल्पना तथा लाप्लास की निहारिका परिकल्पना का वर्णन किया गया है।

- द्वैतवादी संकल्पना में चैम्बरलिन व् मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना, जेम्स जींस (1919 .) जेफ्रीज (1921 .) की ज्वारीय परिकल्पना के बारे में बताया गया है।

पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास
- रेडियो सक्रिय पदार्थों के अध्ययन के द्वारा पृथ्वी की आयु की सबसे विश्वसनीय व्याख्या नहीं हो सकी है। इन पदार्थों के अध्ययन के आधर पर पियरे क्यूरी एवं रदरफोर्ड ने पृथ्वी की आयु को 2-3 अरब वर्ष अनुमानित की है।

- आदी कल्प की चट्टानों में ग्रेनाइट तथा नीस की प्रधानता है। इन शैलों में जीवाश्मों का पुर्णतः आभाव है। इनमें सोना तथा लोहा पाया जाता है, भारत में प्री-कैम्ब्रियन कल में अरावली पर्वत व् धारवाड़ चट्टानों का निर्माण हुआ था।

- प्राचीनतम अवसादी शैलों एवं विन्ध्याचल पर्वतमाला का निर्माण कैम्ब्रियन कल में हुआ।

- अप्लेशियन पर्वतमाला का निर्माण आर्डोविसियन काल में हुआ।

- पर्मियन युग में हर्सीनियन पर्वतीकरण हुए जिनसे स्पेनिश मेसेटा, वोस्जेस, ब्लैक फारेस्ट, अल्लवाई, विएनशान जैसे पर्वत निर्मित हुए।

- ट्रियासिक काल को रेंगने वाले जीवों का काल कहा जाता है, गोंडवाना लैण्ड भूखंड का विभाजन इसी कल में हुआ, जिससे अक्रिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी भारत तथा दक्षिणी अमेरिका के ठोस स्थल बने।

- कृटेशियन काल में एंजियोस्पर्म पौधों का विकास प्रारंभ हुआ। इसी काल में भारत के पठारी भागों में लावा का दरारी उदभेदन हुआ।

- सनोजोइक काल को टर्शियरी युग भी कहा जाता है।

भूगर्भ की प्रमुख  असंबदृताएं

असम्बद्धताएं - स्थिति (लगभग) - गहराई (किमी.)

1. कोनार्ड असम्बद्धता - वाह्य एवं आतंरिक भूपटल के मध्य - -

2. मोहो असम्बद्धता - भूपटल एवं मेंटल के मध्य - 30-35

3. रेपेटी असम्बद्धता - वाह्य एवं आतंरिक मेंटल के मध्य - 700

4. गुटेबर्ग-बाइचर्ट - मेंटल एवं कोर के मध्य - 2900

5. लेहमैन असम्बद्धता - आतंरिक तथा वाह्य कोर के मध्य - 500

पृथ्वी की विभिन्न परतों का संघटन एवं भौतिक गुण

परतें - सापेक्षिक घनत्व - गहराई - तत्व - भौतिक गुण

1. बहरी सियाल - 2.75-2.90 - 1. महाद्वीप के नीचे ६० किमी. तक, 2. अटलांटिक महासागर के नीचे 29 किमी तक, 3. प्रशांत महासागर के नीचे अत्यल्प गहराई तक - मुख्य रूप से सिलिका और अल्युमिनियम तथा अन्य तत्व ऑक्सीजन, पोटैशियम, मैग्नीशियम - ठोस

2. भीतरी सियाल परत - 4.75 - 1. 60 किमी. गहराई तक, 2. 60-1200 किमी. गहराई तक - मुख्यतः सिलिका, मैग्नीशियम, कैल्सियम, अल्युमिनियम, पोटैशियम, सोडियम - प्लास्टिक नुमा

3. मिश्रित परत - 4.75-5.0, सीमा की उपरी अर्द्ध ठोस तथा निचली ठोस परत का मिश्रण - 1200-2900 किमी. - ऑक्सीजन, सिलिका मैग्नीशियम, लोहे का भरी मिश्रण तथा निकिल - प्लास्टिक नुमा

4. केन्द्रक - 7.8-11.0 - 2900-6378 - निकिल तथा लोहा - ठोस या तरल

- उत्तर भारत के विशाल मैदान की उत्पत्ति नवजीवी महाकल्प में हुई।

- पृथ्वी पर उड़ने वाले पक्षियों का आगमन प्लीस्टोसीन काल में हुआ तथा मानव एवं स्तनपायी जीव इसी कल में विकसित हुए।

- 1921 में अल्फ्रेड वेगनर ने सम्पूर्ण विश्व की जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी समस्या को सुलझाने के लिए अपना महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत प्रस्तुत किया। इन्होंने प्रमाणों के आधार पर यह मान लिया कि कार्बोनिफेरस युग तक सम्पूर्ण महाद्वीप एक में मिले हुए थे, जिसे इन्होंने पैन्जिया नाम दिया।

- 1926 में हैरी हेस ने प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत प्रस्तुत किया।

- भू-पटल और उसके नीचे की अनुपटल को सम्मिलित रूप से स्थल खंड कहलाते हैं। 7 बड़ी एवं 20 छोटी भू-प्लेटों में विभक्त हैं। पृथ्वी के स्थलमंडल की मुख्य प्लेटें इस प्रकार हैं-

1. यूरेशियन प्लेट

2. इन्डियन प्लेट

3. अफ़्रीकी प्लेट

4. अमेरिकी प्लेट

5. अंटार्कटिक प्लेट

- अफ्रीका की ग्रेट रिफ्ट वैली अपसारी विवर्तनिकी का अच्छा उदाहरण है।

- अभिसारी विवार्त्मिकी से अन्तःसाgरीय खण्ड एवं गर्त उत्पन्न होते हैं। अभिसारी विवर्तनिकी से प्लेटों पर विनाशात्मक भूकम्पों की बाहुल्यता रहती है।

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